
मुजफ्फरपुर। महाकवि रामइकबाल सिंह राकेश स्मृति समिति के तत्वावधान में आमगोला के शुभानंदी में महाकवि राकेश स्मृति पर्व के आयोजन में राकेश जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद बीआरएबीयू के भूतपूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष साहित्यकार डॉ देवव्रत अकेला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि उत्तर छायावाद के सुप्रसिद्ध कवि राम इकबाल सिंह राकेश शास्त्र और लोक से गहरे जुड़े थे। जहां उन्होंने प्राकृतिक तत्वों को अपने काव्य का आधार बनाया वहां उनके काव्य में महाकाव्यात्मक औदात्य दिखता है और जहां उन्होंने गांव, कृषक, मजदूर, वहां के पशु पक्षी, खेत खलिहान और फसलों का वर्णन किया है वहां लगता है कि संपूर्ण भारतीय गांव का लोक उजागर हो उठा है। राकेश जी को शास्त्र तथा संस्कृत और हिंदी दोनों विषयों का ज्ञान था जिसका उपयोग उन्होंने अपने साहित्य के लिए महत्वपूर्ण कारक के रूप में किया है। लोक जीवन से वे प्रभावित थे तभी तो उनके लेखन की जड़ बहुत गहराई तक पहुंचती है। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ संजय पंकज ने कहा कि मानवीय मूल्यों के तेजी से विघटित होते हुए समय में राकेश जी की कविताएं हमें संवेदनशील बनाती हैं। वे शौर्य, पराक्रम और पुरुषार्थ के आग्रही थे।उनकी रचनाएं भारतीय संस्कृति के वैभवशाली और शाश्वत सत्य को उकेरती है। परंपरा से गहरे जुड़े राकेश प्रगतिशील चेतना से भी आबद्ध हैं। डॉ पंकज ने राकेश के व्यक्तित्व कृतित्व पर विस्तार से बोलते हुए कहा कि उनकी कविता में प्रकृति, धरती, लोकास्था और परंपरा बोलती है। राकेश जी भाषा और भाव संपन्न लेखक थे। उनके शिल्प आकर्षक और अनूठे हैं। उनकी कई कविताएं महाकाव्यात्मक भाव और शिल्प से सुसज्जित हैं। उन्होंने कभी स्वाभिमान, भारतीयता और संस्कार विरुद्ध कोई समझौता नहीं किया। डॉ विजय शंकर मिश्र ने कहा कि सौंदर्य बोध, राष्ट्रीयता और खड़ी बोली हिन्दी की मसृणता के पूर्ण विराम के बाद हिन्दी की जो स्वच्छंदतावादी काव्य धारा प्रगतिशील तत्वों की सजीवता के साथ प्रवाहित हुई - राकेश जी उस धारा के कवि हैं। उन्होंने मिट्टी की सुगंध और जन जीवन की पीड़ा तथा संघर्ष को अपने काव्य में स्थापित किया है। शिक्षाविद मधुमंगल ठाकुर ने कहा कि महाकवि राकेश
केवल छायावादी कवि नहीं थे बल्कि लोक साहित्य मर्मज्ञ भी थे। उनके लोक साहित्य पर काफी शोधकार्य हुए हैं। मैथिली लोक साहित्य पर उन्होंने बहुत श्रम साध्य कार्य किया है। समाजसेवी वे मुकेश त्रिपाठी ने कहा की साहित्य के गौरव राकेश जी ने हिंदी भाषा और साहित्य को अपनी सामाजिक और प्रकृति चेतना से संपन्न किया है। साहित्यकार डॉ हरिकिशोर प्रसाद सिंह ने कहा कि राकेश जी किसान कवि थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए साहित्य के माध्यम से जन जागृति किया। डॉ श्यामल श्रीवास्तव ने कहा कि उनकी हिमालय अभियान कविता राष्ट्रीयता और पराक्रम का अद्वितीय उदाहरण है। कवयित्री डॉ अनु शांडिल्य ने उनकी सीता और काली पर लिखी कविता का उल्लेख किया और कहा कि उनकी रचनाओं में स्त्री विमर्श के कई बिंदुओं को देखा जा सकता है। सोनी सुमन ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की और उद्बोधन में कहा कि महाकवि राकेश भारतीय संस्कृति तथा लोक जीवन के अद्भुत चितेरे हैं। प्रोफेसर अरमान और संजीव साहू ने कहा कि हमारे जनपद के गौरव पुरुष राकेश जी साधक और स्वाभिमानी थे। अपने स्वागत संबोधन में राकेश जी के जामाता ब्रजभूषण शर्मा ने कहा कि मैंने उनके संग साथ में रहते हुए अपने समय के बड़े-बड़े साहित्यकारों को देखने का अवसर प्राप्त किया है। वे साहित्य के लिए संपूर्णत: समर्पित थे और दिन-रात उसी की चिंता तथा चिंतन में डूबे रहते थे। आयोजन में सेंट्रल बैंक के अवकाश प्राप्त पदाधिकारी प्रणय कुमार, डॉ केशव किशोर कनक, विभु कुमारी, प्रेमभूषण, माला कुमारी, चैतन्य चेतन, अनुराग आनंद, पीयूष , राकेश कुमार सिंह, प्रमोद आजाद ने भी विचार व्यक्त किए। धन्यवाद ज्ञापन महाकवि राकेश के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध करने वाले डॉ केशव किशोर कनक ने किया और कहा कि शुद्ध भाषा और श्रेष्ठ भाव तथा मूल्यवान विचारों के मनीषी साहित्यकार थे राकेश जी। आयोजन में डॉ संजय पंकज ने राकेश जी की प्रसिद्ध कविता जब मैं बोला का ओजस्वी पाठ प्रस्तुत किया। उपस्थित कवियों ने अपने बहुरेंगे भावों से भरे गीत कविता गजल की अनुपम अभिव्यक्ति प्रस्तुत की।
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